Kabir

गुरु गोविंद दोऊ खड़े

कबीर का दोहा

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय |
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय ||

गुरु और भगवान दोनों आकर खड़े हो जाएँ तो पहले किसके चरण स्पर्श करें? सचमुच यह यक्ष प्रश्न है | लेकिन गुरु के चरण-स्पर्श करना ही श्रेष्ठतर है, क्योंकि वे ही भगवान तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं |

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4 thoughts on “गुरु गोविंद दोऊ खड़े

  1. Ashok says:

    अब हमे बताए वास्तविक बात, क्या सच मे गुरु के साथ खडे गोविंद के दर्शन कीए थे कबीर जी ने ? क्या इस दोहे मे तीन महानुभव गुरु, गोविंद और कबीर की बात तो है पर गोविंद आँखों से दिखे थे क्या कबीर जी को ?

  2. Ashok says:

    +chetana sachde व्यक्तिगत जानकारी हमें नहीं चाहिए, वास्तव में हमारी पहचान क्या है, कर्म के द्वारा या नाम के द्वारा हम जाने जाते हैं
    + यथार्थ ज्ञान​ उम्र के हिसाब से बचपन पार हो गया हो तो कर्मयोग, बाद मे कर(हाथ) और म(राम प्राण वायु) से जो कर्तव्य है उसे जानना बताना जीवनमें लाना उतारना भक्ति है जीससे नाम होता है। पर आत्म ज्ञान होने पर मनुष्य नाम(भक्ति) रुप(कर्म)से परे स्वयं हि परमात्मा है यह जानने पर अहंब्रह्मास्मि की अनुभूति होती है और कर्म, भक्ति से आगे निकल जाता है।धन्यवाद।

  3. Ashok says:

    “ओह! कितने आश्चर्य की बात है कि हम सब जघन्य पापकर्म करने के लिए उद्यत हो रहे हैं | राज्यसुख भोगने की इच्छा से प्रेरित होकर हम अपने सम्बन्धियों को मारने पर तुले हैं |” ऐसे हि अर्जुन भी प्रकृति(जो शरीर बना बनाया है पहलेसे हि और उसको जिंदा रखने के साधन भी पहले से बने बनाए है उसी को कहते है, प्र=प्रथम से, कृति=बनी बनाई) मे फस गया है मोहित हो गया जीसको वह मै अच्छा हुं एसा सोचता है। जबके “अच्छा तो एक ईश्वर ही है, आज अभी कभीभी इसके अलावा अच्छा कोई नहीं ” ! क्यों के बाकी सब ईश्वर की ही बनी बनाई पहलेसे प्र-कृति है, जीसमें हरेक मनुष्य का परम कर्तव्य है, के वह सदा ईश्वर को पहले आगे रखे, ‘ना के उसकी बनीबनाई माया मे फसे’ “वह तो प्र-कृति है जो अच्छी हो तो भी माया भगवान की नाके मनुष्य की” और इस संपूर्ण पवित्र युद्ध में भगवान श्रेष्ठ थे है और रहेंगे सदा वे सभी को सदा बचाते थे अपने पाप कर्म करनेसे !, के “मुझे मत भूलो मेरी इस माया के चकरावे में आकर के अच्छी हो यां के बूरी” “आप इसे न समझ पाओगे कभी भी मेरे बगैर” इसलिए “ईश्वर साक्षात्कार” करना ‘हरेक मनुष्य का फर्ज और महान कर्तव्य’ है। पर मनुष्य ईश्वर की प्र-कृति में फसकर ईश्वर को भूल जाता है सदा, जैसे अर्जुन के साथ खडे थे “स्वयं ब्रह्म के अवतार नाम रुप लेकर एकसाधारण मनुष्य शरीर में” पर उसे लगताथा नही मै अच्छा हुं !, पर इसके पीछे का सत्य मै ईश्वर हि अच्छा है, “जो सभी जीवो मे है” और ‘सदा बुलवाता है मै अच्छा हूं’। परमात्मा परमेश्वर की एक एक कृति अच्छी है। सभी बोल सकती परमात्मा कि प्र-कृतियां तो “सभी से एक हि आवाज आती मै अच्छी हुं”। अब अच्छी तो होंगी हि क्यों के सब ईश्वर परमेश्वर का हि सृजन है। पर मनुष्य के शरीर को परमात्मा ने अपने जैसे बनाया सबसे बडि उपलब्धि, जीससे ईश्वर खेल का अदभुत अलौकिक नजारा हरेक अलौकिक ईश्वर अंशको देखने सौभाग्य और अनुभव करनेका अवसर मीले। जीवन जीनकी कला दीखानेका देखनेका सौभाग्य प्राप्त हो। पर होता है यह के मनुष्य ईश्वरको छोड, ईश्वर कृति के मजे ले लेकर युं ही जीवन गवा देता है (ईश्वर को छोड कर)। अब बडा आश्चर्य यहहै के, कोई कंपनी कोई भी प्रोडक्ट हो, आपको ऐसी सर्विस कतई नही देता के वह स्वयं अपने प्रोडक्ट के साथ रहे और वक्त वक्त पर आपको आगाह करे, पर परमात्मा ऐसा करते है और ऐसा अवसर सौभाग्य मनुष्य गवा देता है भगवान को छोडकर भगवान की माया को भोगते भोगने में, पर फिर भी “धन्य है भगवान” के और बार फिरसे मनुष्य को अवसर देते रहते है। क्यों के सभी ईश्वर अंश है उपर से अविनाशी, “पर बनी बनाई प्रकृति और शरीर नहीं अविनाशी” “जीव है अविनाशी” पर आजकल आजका मनुष्य तो पूरी तरह फस चूका खुद अपने बनाए निर्जीव प्रोडक्ट मे और स्वयं को भूलगया के “मै ईश्वर अंश तो हुंं ही” और स्वयं का भी साक्षात्कार करलू तो संपूर्ण ईश्वर के साथ जीवन जीनेका अवसर मील सकता है। पहले छोटे को तो जाने मतलब स्वयं तो बडे तक पहोचनेका रास्ता खुलेगा समझे गा समर्पण हो पाएगा धन्यवाद। ईश्वर परमेश्वर अपनी प्रकृति को स्वयं चलाते है जैसे हम छोटे ईश्वर अंश स्वयं को चलाते है जो फसेना अपनी ही बनी बनाई कृति मे, और ना परमात्मा की बनी बनाई प्रकृति मे धन्यवाद। गुरुवर सद्गुरु वर आत्मने परमात्मे नम: आखिर मे यह भगवान लिखवा रहे है कितना भी अच्छाअच्छा लिख लो पर हरेक जीव मेरी हि सत्ता है और मै ने उसे स्वतंत्रतादी है उसे आझादि दी है उसे जो करना है करे मै संभालुगा तुम (मतलब मै जो इतना कुछ लिखा) अपना आत्म कल्याण करो और बाकी सब मुझ पर छोडदो याने ईश्वर साक्षात्कार करनेकी अनुभूति पर आप सभी महानुभवोको नव वर्ष की शुभ अवसरपर धन्यवाद। धन्यवाद। धन्यवाद।

  4. शिवांश says:

    व्गूद इसने मेरे स्कूल के अर्थ खोजने में मदत करी में बहुत खुश हूँ

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