Kabir

खोद-खोद धरती सहै

कबीर का दोहा

खोद-खोद धरती सहै, काट-कूट बनराय |
कुटिल बचन साधू सहै, और से सहा न जाय ||

धरती को कितना ही खोदो, यह चुपचाप सहन कर लेती है | पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलाओ, ये सारे वार हँसकर सह लेते हैं | इसी प्रकार दुष्टों की कुटिल और कठोर बातें केवल साधु-संत ही सह सकते हैं, सामान्य जन में उन्हें सहने की शक्ती नहीं होति |

Standard

कुछ कहिये

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s